Monday, October 26, 2009

कागज़ी दाव-पेच



जब कभी भी मैं किसी ख़ास काम
के होने की वजह से
या फिर बोर होने के कारण
किसी नोट बुक में कुछ- कुछ लिख कर
सीधी लकीरों से उन्हें घेर देता हूँ ,
तो बहुत हल्का महसूस होता है।

ये 'कुछ -कुछ' कुछ और नहीं बल्कि
होती हैं मेरी ज़िन्दगी की छोटी से छोटी
से लेकर सबसे बड़ी मुसीबतों का हल-
जो मैं कहीं भी बैठे-बैठे
कुछ जोड़-भाग लगाकर
या कुछ तो सोचकर बस लिख देता हूँ।

ऐसा करने के उपरान्त मुझे सच में
बहुत अच्छा लगता है-
उतना ही जितना की अभी मुझे 'उपरान्त' शब्द
के इस्तमाल के बाद आया।

पर उससे भी रोचक लगता है उन
दूरदर्शी समाधानों को घेर देना-
बॉक्स की आकार में
और उसपर फिर से पेन चलाना ताकि
वो घेराव इतनी मजबूत हो जाए कि
उसमे से कोई भी प्लान छिटक जाए ,
ही लीक हो पाए।

ऐसा में हमेशा से करते आया हूँ-
कुछ-कुछ कहीं भी , किसी टुकड़े पे लिख देना।
विचारों को तोड़-मरोड़ कर, ख्यालों का पंख देकर
सपनों कि दुनिया में 'फू' कर के उड़ा देना-
पर वैसी उड़ान नहीं कि जैसा पंछियों का होता है-
पैना और उम्दा,
किसी घोंसले की ओर
बल्कि वैसा
जैसा की रुई के बीज को
हलकी फूँक दे दो बहती हवा की ओर
तो वो उड़ता-उड़ता कहीं तो पहुँच जाता है-
पेड़ों ओर लोगों के बीच से निकलकर-
हौर्न बजाते।

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