Monday, October 26, 2009

ख्यालों में तुम्हारे




हर शाम की कहानी वही-
तकिये में लिपटे बाल
ख्यालों में तुम्हारे
गानों का बदलना, चादरों का सिकुड़ना
पर तुम्हें वैसे ही देखते रहना
कुछ कहना
रुकना
फिर से कहना- इस बार कुछ बेहतर
तब तक-
की जब तक
तुम्हारी आँखों में हँसी दिख जाए
और गालों में प्यार- मेरे लिए।
तब तक तुम क़ैद एक ही तस्वीर में-
उसी समय में, उन्हीं कपड़ों में
जिसमे की अभी मैनें तुम्हे कुछ कहा था।

तुम थक तो नहीं जाती ना ?

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