Thursday, September 30, 2010

सोचता हूँ





















काफ़ी अरसे से जोत लिया हल यहाँ देहात में
सोचता हूँ अब शहर जाऊँ चार पैसे कमा आऊँ

किया भला दुनिया का, जितना भी होता गया
सोचता हूँ अब कहीं से उनका नाम-पता खोज आऊँ

बधाईयाँ तो उनकी मिलती ही रहेंगी ज़िन्दगी भर
सोचता हूँ जान-पहचान से कुछ मतलब सधा आऊँ

बहुत सहूलियत से थामता रहा इन रिश्तों के डोर
सोचता हूँ आज मँझा बना इनसे पतंग लड़ा आऊँ


इतनी कड़वी दवाईयाँ पी चुका
















इतनी कड़वी दवाईयाँ पी चुका
कि अब मीठी गोली बे ईमान लगती है

थक गयी सबको खुश करते करते
अब समझा वो क्यूँ परेशान लगती है

बनो खुद में ही कुछ, बनो अपने जैसे
ये मशहूर अदाएँ एक समान लगती हैं

साथ चलने दो कदम की भी हैं अपनी मुश्किलें
भले ही दिखने में ये तुम्हें आसान लगती है

बह मत जा इस ख़ुशनसीबी की रवानगी पे
हो न हो, ये कुछ ही दिन की मेहमान लगती है


वाकिफ़ कराया तुमने मुझे



















वाकिफ़ कराया तुमने मुझे हलावत-ए-दर्द-ए-मुहब्बत से
और यकीन दिलाया दिल को तोड़ किश्तों में

चलूँ अब, छोड़ रखा था काम इतना सारा किसी मुद्दत से
देख लिया जो भी देखना था इन रिश्तों में

गुज़र रहे हैं दिन आजकल अच्छे, हू-ब-हू कल जैसे
करे भी तो कौन अब ऐतबार इन फरिश्तों में




Wednesday, September 29, 2010

कछुआ जलाओ रे, मच्छर बहुत है





















कैसा है ये कुबड़ा पहाड़
दुबका हुआ चुपचाप ?

और देखो इस सूरज को-
जिसे कान खींच
ले जाया जाता वापस
हर शाम
तारें कर रहे हैं उठक-बैठक
चाँद है बाहर मुर्गा बना
आसमान का छाता है छिदा हुआ
जिससे चू जाती बासी बारिश
बादल हैं बिखरे रुवें
जिस बिस्तर पे अभी शाम को पड़ी छड़ी
ये ओस हैं रात के आँसू
जो रोता कमरे में बंद पड़ा
देखने जो नहीं मिलता
दुनिया की टी वी
भोर को रोज़ पड़ती है डाँट
संवारता नहीं है चादर अपना समय से
दोपहर का है खाना बंद
मोटा गया है सो-सो के


कुछ लोग





















विकासक्रम ने बो दिया
हमारा एक वंश वृक्ष
जो चलता आ रहा सदियों से
फैलाता अपनी भुजाएँ
बनता विशालकाय
मानव रजिस्टर के पन्नों से परे
निचोड़ पूरे मनुष्य को
अपने भुजंग चपेट में

मैं भी हूँ इसके एक सिरे का अंश
ला पटकाया यहाँ अपनी इस नोक पे
न जाने किन गहन लम्बे रास्तों से होते
लग गए कितने ज़माने इस धारणा के जन्म में
जिसे आज 'मैं' कह संबोधित करता हूँ

अब पहुँच कर यहाँ, है मेरे कन्धों पर
दायित्व और बिना कोई शक के उम्मीद
अपने इस सिरे को आगे फैलाने का
क्यूंकि ये जो पेड़ है, ये इंसानों की ज़िन्दगी
की गोबर खा फूलता-फलता है, किस्म जो भी हो-
ज़िन्दगी आगे बढ़ रही, तो यह भी आगे बढ़ रहा

मेरे इस नव अंकुरित छोर को आगे बढ़ाने की
अपेक्षा कर रहे इस दानवी वृक्ष के कंकाल,
कंकाल ही- क्यूंकि अब वो पुरातन पूर्वज तो
अपनी हाड़-मांस त्याग सोये पड़े हैं कहीं
बची उनकी आस्तित्व की बस कुछ कहानियाँ
जो चली उनसे दो-तीन सतह नीचे
फिर खो गयी वो भी कहीं
न जान पाने की वजह से
न दोहराए जाने की वजह से

कितना खाली होता है वो सूनापन
जब इस झाड़ीदार समकालीनों के बीच
एक आदमी पड़ जाता है अकेला
न बचा पिछला कोई
न ख्वाहिश अगलों की
केवल वो- बिलकुल अकेला

ढूँढता गर्मी जहाँ मिल जाए
जिससे मिल जाए
प्रेयसी की बाहों में
तवायफ की कराहों में
बचाता है खुद को
अपनी व्यवसाय की चादर ओढ़
इस दाँत कटकटाने वाली ठिठुरन से
लेकर अपनी लतों की गर्मी
और कर दोस्तों के साथ कुछ दूर चहल कदमी
पर अब ये मित्र पहले जैसे कहाँ?
ये भी हैं अब व्यस्त
इस वृक्ष की पालन पोषण में
अपनी उपज की जिम्मेदारियों से
ताकि चले उनकी भी कहानी
कुछ और आगे

और ऐसे ही चलता रहता है कश्म-कश
उस अकेले का खालीपन से
कभी कुछ पुरानी आदतें काम आ जाएँ
तो कभी कोई नया शौक
मतलब ज्यादा नहीं रहता
कि कौन है, कौन नहीं
पर होता है संदेह
कौन-कौन हो सकते थे ?
फिर एक दिन हो जाती
है उसकी कहानी ख़त्म
और साथ ही इसके
कई सदियों से चली आ रही वो एक बहाव भी-
उसकी तस्वीर अब
किसी फ्रेम पे नहीं सजेगी
उसे कैसा संगीत पसंद था
ये चर्चा कभी न होगी

पर बात यहाँ ख़त्म नहीं होती-

एक इंसान के वजूद का माप
उसके परिजनों में बसी
उसकी जमी यादों के गहराई
से नहीं करते
बल्कि उसकी पुष्टि होती है
गैरों के ज़हन में
बार बार दोहराई
उसकी बसर ज़िन्दगी की कल्पना से