Friday, October 30, 2009

याद हो तुम मुझे अब भी



अब भी है बिखरी सदा तुम्हारी
मेरी इन अधूरी कविताओं में
जो मैं अपने दिल को फुसलाने
के लिए लिख देता हूँ
यूँ ही
ये सोच के -
कि अगर तुम किसी तरह इन्हें पढ़ लो,
भूल से
शायद अगली सदी में,
तो तुम्हें ये एहसास हो
कि पिछली सदी में
जिसे तुमने छोड़ आया था बेफिक्र,
वो है अब भी वाकिफ़-
हर एक बीते लफ्ज़ से तुम्हारी,
जिसके हर पेचीदे फैसले को
था आसां बनाया बस सदा ने तुम्हारी
कि उसने चुनी तो सिर्फ़ वोही मँजिल चुनी
जिसकी हर राह में
बसती सदा थी तुम्हारी

...और फिर तुम जाओ
एका-एक एक दिन
सामने मेरे,
लेकर मेरे सारे ख़त-
थूक से सटाए
रुपैये की स्टैंप वाले
लिफाफे के साथ,
ये बताने
कि तुम्हें भी था इंतज़ार
उधर मेरे अगले ख़त का।


आग सेंकते सपने



ये सुदूर सपने-
जिन्हें आँखें देखा करती हैं
ये बस एक सोच है- एक अलसाई सोच
और कुछ भी नहीं
जिसके गठ्ने से तम्मनाओं में बहाव
तो जाता है ,
जो ले तो चल पड़ता है इसे
जहाँ-तहाँ , बिना डर के
किसी रेतीले निर्जीव राह से भी,
मचाते उथल-पुथल
काँटों की गोद में - बिना उनको भाव दिए
पर
थम जाता है ये बहाव भी- आगे कुछ और दूर
अपने आप के कम जाने से,
बहुत ही दूर जाने से,
रस्ता रोकने वाले तमाम बाँध के कारण भी
और बन के रह जाता हमारा जीवन
इन रंग-बिरंगी सपनों का ही काला ढेर,
कल ही के बेचैन ख्वाबों का स्थायी पड़ाव
जो गली का भगाया झोंका भी उड़ा फेंकता है
एक एकांत धूमिल क्षितिज पे-

जब की देखा जाए तो
ये एह्सास होता है- जिन्दा
सुन्न,
सुस्त,
अधूरा,
दशमलव गर्माहट
का,
अपने ही चिता पे बैठा आग सेंकता-

मगर अब भी
जिंदा।


Thursday, October 29, 2009

कब से खामोश- ये सड़क


कहा कुछ
पुछा बहुत
बस चल पड़ा एक दिखायी देती दिशा की तरफ़,
बेजुबान राह पर उस-
जो था शिथिल, सुसुप्त।

तुमने कहा था
ख़ुद रास्ता ही बतलायेगा
मँजिल मेरी।
भले ही क्यूँ
दिखता हो ये गूँगा,
कर रहा मगर चुपचाप ये चिंतन
एक मौनी बाबा की तरह।



बीत चुकी कितनी सुबहें और कितने पतझड़
कि अब उँगलियाँ थक गई हिसाब लगाते,
मगर देखो अब भी
सोया ही पड़ा है ये रस्ता
बिना खर्राटे के-
कोई इशारा
गलती से ही कोई संकेत।

रुक क्यूँ गया ये यका-यक मेरे चलते ही ?
थक गया क्या ये समझ बाँटते-बाँटते , और कर लिया अपना काउन्टर बंद
ठीक मेरे सामने ?
आख़िर हो क्या गया तुम्हारे इस पहुँचे
मुनि को?

Wednesday, October 28, 2009

मुझे मेरे स्वप्नों से मुक्त करो



बहुत जिया, बहुत भटका
मगर मिला नहीं वो
जिसकी चाह जगाई तुमने।
बहुत खोजा, आस लगाई
चलता ही रहा, पर ख़त्म नहीं हुआ
जो राह थमाई तुमने।


बहुत सोचा , ढूँढता रहा-
चौंकता हुआ, विस्मित
कभी इस दर पे, तो कभी उस गली में
अब देखा नहीं जाता-
थक गए पाँव , बोझिल हुई पलकें
अब इन आँखों को सुसुप्त करो

मुझे मेरे स्वप्नों से मुक्त
करो।



Monday, October 26, 2009

ख्यालों में तुम्हारे




हर शाम की कहानी वही-
तकिये में लिपटे बाल
ख्यालों में तुम्हारे
गानों का बदलना, चादरों का सिकुड़ना
पर तुम्हें वैसे ही देखते रहना
कुछ कहना
रुकना
फिर से कहना- इस बार कुछ बेहतर
तब तक-
की जब तक
तुम्हारी आँखों में हँसी दिख जाए
और गालों में प्यार- मेरे लिए।
तब तक तुम क़ैद एक ही तस्वीर में-
उसी समय में, उन्हीं कपड़ों में
जिसमे की अभी मैनें तुम्हे कुछ कहा था।

तुम थक तो नहीं जाती ना ?

कागज़ी दाव-पेच



जब कभी भी मैं किसी ख़ास काम
के होने की वजह से
या फिर बोर होने के कारण
किसी नोट बुक में कुछ- कुछ लिख कर
सीधी लकीरों से उन्हें घेर देता हूँ ,
तो बहुत हल्का महसूस होता है।

ये 'कुछ -कुछ' कुछ और नहीं बल्कि
होती हैं मेरी ज़िन्दगी की छोटी से छोटी
से लेकर सबसे बड़ी मुसीबतों का हल-
जो मैं कहीं भी बैठे-बैठे
कुछ जोड़-भाग लगाकर
या कुछ तो सोचकर बस लिख देता हूँ।

ऐसा करने के उपरान्त मुझे सच में
बहुत अच्छा लगता है-
उतना ही जितना की अभी मुझे 'उपरान्त' शब्द
के इस्तमाल के बाद आया।

पर उससे भी रोचक लगता है उन
दूरदर्शी समाधानों को घेर देना-
बॉक्स की आकार में
और उसपर फिर से पेन चलाना ताकि
वो घेराव इतनी मजबूत हो जाए कि
उसमे से कोई भी प्लान छिटक जाए ,
ही लीक हो पाए।

ऐसा में हमेशा से करते आया हूँ-
कुछ-कुछ कहीं भी , किसी टुकड़े पे लिख देना।
विचारों को तोड़-मरोड़ कर, ख्यालों का पंख देकर
सपनों कि दुनिया में 'फू' कर के उड़ा देना-
पर वैसी उड़ान नहीं कि जैसा पंछियों का होता है-
पैना और उम्दा,
किसी घोंसले की ओर
बल्कि वैसा
जैसा की रुई के बीज को
हलकी फूँक दे दो बहती हवा की ओर
तो वो उड़ता-उड़ता कहीं तो पहुँच जाता है-
पेड़ों ओर लोगों के बीच से निकलकर-
हौर्न बजाते।

कुछ चीज़ों का मिलना जायज़ है



दे दो स्वर्णिम वरदान
उजालों के साहूकार-
कुछ भी रख दें हम गिरवी,
की फिसल जाएँ
अन्दर हम अन्तरवस्त्र के
जब चाहें , जिधर भी
हो कर नतमस्तक उन पावन ऊँचाइयों के
जिसपर बसती हमारी लालसा की देवी
लिपटी चादर में अनेक रंगों के
और देती बुलावा छुपे हुए
जिसके लिए करना पड़ता लंबा सफर-
कठिनाइयों और हिम्मत से भरा।

जिसकी प्यास का पिपासु तो बना दिया
बचपन से हमें,
कस तो दी तुमने एक बार चाभी हमारी
छोड़ने से पहले,
पर चलते भटकते इधर से उधर
रुक पड़े हम शिथिल
राह तकते-
की भेज दो शायद तुम किसी को
फिर से
हमारी चाभी कस देने।

हग दिया कौऐ ने



हग दिया कौऐ ने
काला-सफ़ेद, एक सड़क पर
लगा के ब्रश बना दिया एक तस्वीर
चित्रकार ने उस से

मूत दिया भैंस ने पेट की नाली से
झर-झर
नहा रहे नंगे बच्चे उसमें मचल कर
निर्वस्त्र ये- जो पोंछते अपनी चुत्तड़
केले के पत्ते से, और पोतते घर गाय
के गोबर से।

तुम्हारी तस्वीर फैला चुकी दुर्गन्ध-
उनका घर, धूप से झुलस
और जलधारा से ओत-प्रोत,
फिर भी खुशबूदार।

एक भयानक बदलाव


जिसके देह में फरता था चिल्लड़ बेपनाह
और विचरते थे खुल के जुएँ जहाँ-तहाँ
जिसके कपड़े थे पसीने की पपड़ी से लथपथ
चुने के रंग में कमीज़, और कालिख पुती पैंट
वो कब से रात में जाग-जाग कर टिकिया घसने लगा ?

जो खैनी ग्रसित भूरे दाँतों को ले
मारता था बेफिक्र ठहाका
जिसके मुँह से निकलता था गंध विषैला
वो कब से दो-दो बार दातुन करने लगा ?

अनगिनत कंचुकियों को चूसने वाले चमगादड़
और रण्डियों की रात गमकाने वाले पिशा
तू कब से कलम में दवात भरने लगा ?

बदसूरत चेहरे का बोझ



मैं ये सब भी हूँ।

जो सपनों की तपिश में जलता है
धू-धू , घी की तरह
पर फिर भी पनपता है
इन नग्न समुदाय के बीच-
एक खुशनुमा पलस्तर वाले नाली के कीड़े की तरह।

जो जिस्मानी गर्मी ढूँढता है
शहर के हर कोने में, गलियों में
ट्रेनों में, बसों में-
एक घृणित, घाव भरे कमज़ोर कुत्ते की तरह।

जो बदसूरत इरादे रखता है
हर उस खूबसूरत चीज़ से जो
उसे कभी मिला है, कभी मिलेगा
बस जिसकी चाह दिल में मसोस के
बूढा जाएगा-
मक्खियों से घिरे, गले हुऐ एक काले केले की तरह।

हाँ प्रिये, मैं ये सब भी हूँ।

इस तस्वीर का टूटना बनता है


इन जंगलों और खेतों
के बीचों-बीच भागती, टेढ़ी-मेढ़ी
ये रेलगाड़ी नहीं है- साँप है।

तू लाल लिबास से छिपी हुई
झकझोरों से हिलती, उफनती
औरत नहीं है- आग है।

ये लोग भी नहीं हैं लोग
जो लगे हैं करने तुझे मेरी नज़रों से दूर
ये हैं समाज द्वारा प्रशिक्षित-
नैतिकता में सर्टिफाईड
उचित- अनुचित में डिप्लोमा
हासिल किए बेहुदे सूअर की फौज-
जो दूसरे सूअरों की अनुपस्तिथि में
ख़ुद उस नाली में नहायें
जिसके लिए दूसरों पे किकियायें
जो शीघ्र ही कर देंगे अपने मनुज बच्चों
को भी नए ज़माने के समकालीन सूअर।
जो छिपा तो रखेंगे अपने परिवार की सुअरनियों को
पर ताकेंगे नाक फुला के दूसरे सुअरनी के थन को।

और इनके बीच बैठे हम बन चुके हैं
महज एक नैतिकता दर्शाती तस्वीर
जो बनती हैं कितनी हीं
साँप सी रेलगाड़ी के अन्दर
हर रोज़। अनगिनत।

हम दोनों जैसे ही होते हैं
जाने कितने लोग
जो रह जाते हैं मन मसोसकर,
बनकर मात्र बस दो पात्र
इस चिड़चिडे से तस्वीर में-
और फिर उतरकर इस विषैली गाड़ी से
लेते हुए अपना बकवास सा सामान-
भरा हुआ झूठे किताबों से,
चल देते हैं अगली तस्वीर का हिस्सा बनने।

दर्द और सिगरेट


जान मार देती है एक बन्दी
एक बन्दे का-
सिगरेट पिला-पिला के,
जब उसका तोड़ देती है दिल
और छोड़ देती है सड़क पे
गाड़ी से कुचल जाने
बेपरवाह

जब वो दारु में नहा -नहा के
रेंगता है अपनी ही उलटी में
पर फिर भी नही जा पाती आदत
उसको सोचते रहने की,
उस पे आस लगाये रहने की
कुछ तो...
कैसे भी...

ऐसी कितनी मौतें मरके
पैदा हुआ हूँ मैं फिर
अपनी धू-धू जल चुकी राख से
दिल लेकर नया, बिना खरोंच,
बेनिशान।

पर अब चुकी है मुझमें
पहचान
ऐसी मकड़ियों की
जो चूस लेती हैं सारा प्यार
और देती हैं उसके बदले
बस- दर्द और सिगरेट

अपने हाथों के सिराहने पे



अपने हाथों के सिराहने पे
सर छुपा कर, आंखों को मूँद
जब झाँकता हूँ अंधेरे में-
कुछ दिखता है अजीब सा वहाँ
कुछ सूझता है अजीब सा वहाँ

जाने कहाँ से जाती हैं ये सारी बातें
जाने किस बाज़ार में पकड़ लेती हैं ये
मुझे चलते-चलते

शायद मेरे चप्पल में सट जाती हैं
सब्जी की गलियों में
या फिर पीठ पे गिर जाती हैं
किसी पेड़ के ऊपर से

होने को तो ये भी हो सकता है की ये
अटक जाती हैं मेरे बालों में
जब मैं खिड़की पे सर रखता हूँ बस में
या फिर अचानक मेरे पॉकेट में बैठती हैं
जब दरवाजे पे खड़ा रहता हूँ में ट्रेनों पे

और फिर ये सहेलियाँ दिखती हैं
अपनी रंग-बिरंगी साड़ियों में-
कभी मन बहलाने , रिझाने
तो कभी उलझाने, अकेला बनाने

और अक्सर ऐसा होता है कि
इनके जमघट से टूट पड़ता है वो
कच्चा पूल- जो जोड़ती है
मेरी सोती और जागती दुनिया को,
और लगाती हैं ये सारी फिर
गोते, डूबकी, रेस
अपने हर एक रूप में
चाहे हो वो हल्के, बुझे या ठेस

हाँ शायद ऐसा ही होता होगा
मेरी सोयी आंखों में
जब मैं अपने हाथों के सिराहने पे
सर छुपा, झाँकता हूँ अंधेरे में।

शिष्टाचारी बलात्कारी, लापता कृष्ण


बलात्कारी खडे सारे पंक्ति में शालीनता से ,
अपने मौके के इंतज़ार में -
चुपचाप।

चीत्कार युवती की बिना कृष्ण के दिशाहीन ,
दुस्शासन के कान से जाँघों तक

हैरत


उस अंजान बेपरवाह रहगुज़र में
वे खामोशी हरदम किसके थे ?


तू जा तो पहुँचा उस तरफ़
मगर वे कदम किसके थे ?

असमंजस


जिन्हे तुम सुंदर कहते थे ....वो अपनी कुरूपता से भयभीत होकर भाग खड़ी हुवीं

____कुमार अरुणाचल

...... और मैं


धुंधलाता मंज़र
बरसता धुआं
सुखा बरगद
मुरझाया पत्ता

न हवा
न दायरा

बस रात....
और मैं



अधूरा आइना
सिमटता कारवाँ
बिखरती मंजिल
झुलसती यादें

न रंजिश
न शिकवा

बस फासला.....
और मैं



अन-चाही साँस
वीरानी चाहत
कतराती एहसास
अकेली आहट

न प्यास
न करवट

बस तन्हाई.....
और मैं



सुस्त रास्ता
बरसता आसमान
बहता कागज़
डूबता दरिया


न कल
न आज

बस लम्हा.....
और मैं

ये कैसी नीयत ?


इस दिल की आरजू पे होती है हैरत
की ये साथ तो तुम्हारा चाहता है
मगर तुम्हारी आदत नही चाहता।