Tuesday, March 19, 2019

सोचता हूँ



अरसे से बस जोतता रहा हल, यहीं देहात में
सोचता हूँ अब शहर जाऊँ, चार पैसे कमा आऊँ

करता रहा भला, जहाँ जितना भी हो सका
सोचता हूँ अब उनका नाम-पता खोज आऊँ

बहुत सहूलियत से थामता रहा इन रिश्तों के डोर
सोचता हूँ अब मँझा बना इनसे पतंग लड़ा आऊँ


Wednesday, September 29, 2010

कछुआ जलाओ रे, बहुत मच्छर है



कैसा है ये कुबड़ा पहाड़
दुबका हुआ चुपचाप ?
और देखो इस सूरज को-
जिसे कान खींच
ले जाया जाता वापस
हर शाम
तारें कर रहे हैं उठक-बैठक
चाँद है बाहर मुर्गा बना
आसमान का छाता है छिदा हुआ
जिससे चू जाती बासी बारिश
बादल हैं बिखरे रुवें
जिस बिस्तर पे अभी शाम को पड़ी छड़ी
ये ओस हैं रात के आँसू
जो रोता कमरे में बंद पड़ा
देखने जो नहीं मिलता
दुनिया की टी वी
भोर को रोज़ पड़ती है डाँट
संवारता नहीं है चादर अपना समय से
दोपहर का है खाना बंद
मोटा गया है सो-सो के


कुछ लोग



विकासक्रम ने बो दिया
हमारा एक वंश वृक्ष
जो चलता आ रहा सदियों से
फैलाता अपनी भुजाएँ
बनता विशालकाय
मानव रजिस्टर के पन्नों से परे
निचोड़ पूरे मनुष्य को
अपने भुजंग चपेट में

मैं भी हूँ इसके एक सिरे का अंश
ला पटकाया यहाँ अपनी इस नोक पे
न जाने किन गहन लम्बे रास्तों से होते
लग गए कितने ज़माने इस धारणा के जन्म में
जिसे आज 'मैं' कह संबोधित करता हूँ

अब पहुँच कर यहाँ, है मेरे कन्धों पर
दायित्व और बिना कोई शक के उम्मीद
अपने इस सिरे को आगे फैलाने का
क्यूंकि ये जो पेड़ है, ये इंसानों की ज़िन्दगी
की गोबर खा फूलता-फलता है, किस्म जो भी हो-
ज़िन्दगी आगे बढ़ रही, तो यह भी आगे बढ़ रहा

मेरे इस नव अंकुरित छोर को आगे बढ़ाने की
अपेक्षा कर रहे इस दानवी वृक्ष के कंकाल,
कंकाल ही- क्यूंकि अब वो पुरातन पूर्वज तो
अपनी हाड़-मांस त्याग सोये पड़े हैं कहीं
बची उनकी आस्तित्व की बस कुछ कहानियाँ
जो चली उनसे दो-तीन सतह नीचे
फिर खो गयी वो भी कहीं
न जान पाने की वजह से
न दोहराए जाने की वजह से

कितना खाली होता है वो सूनापन
जब इस झाड़ीदार समकालीनों के बीच
एक आदमी पड़ जाता है अकेला
न बचा पिछला कोई
न ख्वाहिश अगलों की
केवल वो- बिलकुल अकेला

ढूँढता गर्मी जहाँ मिल जाए
जिससे मिल जाए
प्रेयसी की बाहों में
तवायफ की कराहों में
बचाता है खुद को
अपनी व्यवसाय की चादर ओढ़
इस दाँत कटकटाने वाली ठिठुरन से
लेकर अपनी लतों की गर्मी
और कर दोस्तों के साथ कुछ दूर चहल कदमी
पर अब ये मित्र पहले जैसे कहाँ?
ये भी हैं अब व्यस्त
इस वृक्ष की पालन पोषण में
अपनी उपज की जिम्मेदारियों से
ताकि चले उनकी भी कहानी
कुछ और आगे

और ऐसे ही चलता रहता है कश्म-कश
उस अकेले का खालीपन से
कभी कुछ पुरानी आदतें काम आ जाएँ
तो कभी कोई नया शौक
मतलब ज्यादा नहीं रहता
कि कौन है, कौन नहीं
पर होता है संदेह
कौन-कौन हो सकते थे ?
फिर एक दिन हो जाती
है उसकी कहानी ख़त्म
और साथ ही इसके
कई सदियों से चली आ रही वो एक बहाव भी-
उसकी तस्वीर अब
किसी फ्रेम पे नहीं सजेगी
उसे कैसा संगीत पसंद था
ये चर्चा कभी न होगी

पर बात यहाँ ख़त्म नहीं होती-

एक इंसान के वजूद का माप
उसके परिजनों में बसी
उसकी जमी यादों के गहराई
से नहीं करते
बल्कि उसकी पुष्टि होती है
गैरों के ज़हन में
बार बार दोहराई
उसकी बसर ज़िन्दगी की कल्पना से



Tuesday, September 28, 2010

चला दो गोली



स्केच पेन है हथगोला
पेंटिंग ब्रश है तोप
पाईलौट पेन है मशीन गन
लीड पेन है पिस्तौल
और एक कलम रिवॉल्वर

एक खाली रिवॉल्वर
उतना ही सुन्दर दिखता है
जितना की एक भरी कलम

पर कलम से कागज़ कुरेदने को
केवल एक शौक़ बनाने से बेहतर है
खतरनाक सोच की कारतूस डाल
तमन्चे का घोड़ा दबाना




जिज्ञासा एक बालक की जो गणित में पास न हो सका



एक पहुँचा संत
उठा के पत्थर
अगर फोड़ दे मेरा सर
तो इसे क्या समझूँ ?

मेरी बात का विषैलापन
या उसके साधना की विफलता ?

क्यूँ हो जाती है फाँसी माफ़
उस जघन्य अपराधी की
जब वो कर लेता है ख़ुदकुशी ?


मेरे चिट्ठे को लौटा देती
गुस्से से, बिन दिए जवाब
पर आकर बैठती मेरे ही बगल
दोनों सेक्शन की संयुक्त क्लास में

ये हमारी समीपता है या समापन ?