Sunday, September 26, 2010

रमेश लव प्रिया





















स्कूल
की मेज में,
मिनी बस की सीट पे,
बस स्टॉप की दीवारों पे ,
लोकल ट्रेन के दरवाज़े पे,
पुरुष शौचालय में पहुँच सकती
मूत्र धार से काफ़ी ऊपर,
और पिकनिक स्थल के बड़े-बड़े
चट्टानों में भी
उतनी ही बड़ी अक्षरों से-

हर तरफ है बसा तुम्हारा ही प्रेम
रमेश।

चिंता की कोई ज़रूरत नहीं
प्रिया को भी है तुमसे उतनी ही मोहब्बत-
दो-तीन बार नस काटी होगी तुमने
एक-आध बार चूहे का विष भी
नीलकंठ जैसा साहसी हो
किया गया होगा तुमने धारण

इसलिए आज तुम्हे सजाना अच्छा लगता है दुनिया को-
अपने प्यार के इकरार से,
इसलिए ही दिखाना अच्छा लगता है दुनिया को
फल अपनी तपस्या का-
जब पीछा किया करते थे अपने चाचा की
मोटरसाईकिल से,
पहचानते हर उस गली को
जहाँ से वो गुज़रती
और रहते सजग, सर्वव्यापी हमेशा
अपने सनम की आशिकी में

पर ये तो बताओ कहाँ से लाया
उतना चूना
उस बड़ी चट्टान की पुताई के लिए ?

4 comments:

  1. पूरे लंठ हो यार! कहाँ छिपे थे अब तक?
    ये word verification तो हटा दो!

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  2. your poetry reminds more of the kind of cinema of Anurag (Kashyap), Dibakar, Kubrick or even Bunuel..dark, crude, acerbic and surreal...sometimes!!!!
    immensely enjoyed(if an eccentric agony falls in this definition!) the pain of reading some of those posted on blog...keep on!!!

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  3. Magnum Opus ji Magnum Opus ! Fame deserves U.

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  4. बढिया। शानदार। क्‍या नज़र है।

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