Monday, September 27, 2010

धूमकेतु



















इस अंडज ब्रम्हाण्ड के किसी ओर से
निकल पड़े चमकाते अपनी तलवार
लेकर ये ज्वाल, ये आलोक , ये उबाल
कर सका कोई क्षतिग्रस्त
कोई पाया तुम्हें लपेट
न ही तुम सुस्ताये बन अतिथि किसी के

चल
रहा तुम्हारा यात्रा निर्विघ्न
जाने सृष्टि के किस काल से
देखा तुमने क्रोधित मुनि कपिल का शाप
फिर देखा भागीरथ को स्तुति में लीन
आज देख रहे यहाँ गंगा का बहता चाप

रहो तीव्रता से ऐसे ही गतिमान तुम
कि हो दृष्टिगत जिसे भी
हो जाए उनकी सोती जीवन अवगत
एक खुले विशाल आह्वान से,
और चमक पड़े मनस्व पटेल सदैव के लिए
इस जगमगाती चौंध से

जो देख ले कोई बच्चा
तो माँगे पापा से
तुम्हारे जैसा ही रॉकेट
अगली दिवाली



1 comment:

  1. 'चमक पड़े मनस्व पटेल सदैव के लिए'
    की व्याख्या अपेक्षित है।


    @जो देख ले कोई बच्चा
    तो माँगे पापा से
    तुम्हारे जैसा ही रॉकेट
    अगली दिवाली

    मैंने बिन देखे ही आँख मूँद कर एक प्रार्थना की है।

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