Thursday, September 30, 2010

सोचता हूँ





















काफ़ी अरसे से जोत लिया हल यहाँ देहात में
सोचता हूँ अब शहर जाऊँ चार पैसे कमा आऊँ

किया भला दुनिया का, जितना भी होता गया
सोचता हूँ अब कहीं से उनका नाम-पता खोज आऊँ

बधाईयाँ तो उनकी मिलती ही रहेंगी ज़िन्दगी भर
सोचता हूँ जान-पहचान से कुछ मतलब सधा आऊँ

बहुत सहूलियत से थामता रहा इन रिश्तों के डोर
सोचता हूँ आज मँझा बना इनसे पतंग लड़ा आऊँ


7 comments:

  1. @बहुत सहूलियत से थामता रहा इन रिश्तों के डोर
    सोचता हूँ आज मँझा बना इनसे पतंग लड़ा आऊँ

    स्तब्ध हूँ।

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  2. This comment has been removed by the author.

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  3. bahut hi khubsurat aapki rachna hai...

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  5. आज सागर ने आपके ब्लॉग को बज़ पर शेयर किया था...वहीँ से आप तक पहुंची...आप लिखते बहुत अच्छा हो.
    ऐसा सोलिड लिखा बड़े दिन बाद पढ़ा है...पर ये अचानक इतना लंबा विराम क्यूँ?

    अगर आपके लिखने से ब्रेक लिया है तो प्लीज लिखना फिर शुरू करें. आपकी...चला दो गोली खास तौर से बहुत पसंद आई.

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